जिंदगी से इश्क़ होने तक
कविता: "जिंदगी से इश्क़ होने तक"
ज़िंदगी जो भी दे—कभी हँसी, कभी ग़म—हर रंग को अपनी रूह में पिरोया कर!
जो आज है, वो कल नहीं होगा—इस सच को धीरे-धीरे अपने भीतर बोया कर!
वक़्त की हथेली पर जो पल टिक जाए, उसे ही अपना छोटा सा त्योहार समझा कर!
जो छूट गया, उसे इज़्ज़त दे देना—पर खुद को खाली-खाली मत खोया कर!
यादों को बस याद रहने दे, उन्हें हर रात अपनी नींद का दुश्मन न बनाया कर!
हर रात का अँधेरा भी सिखाता है, कि उजाले का मतलब सिर्फ़ सूरज नहीं होता।
कभी-कभी दीपक भी काफी होता है, बस उसे हवाओं के सामने झुकाया न कर!
जो मिला है—अच्छा या बुरा—उसमें भी कोई न कोई सीख छुपी रहती है!
हर ठोकर को तालीम समझ, मगर अपने आप को हर बार दोषी न ठहराया कर!
कभी-कभी हार भी रहमत होती है, वो अहंकार के कंगन तोड़ दिया करती है!
और कभी-कभी खामोशी भी दुआ होती है, जो भीतर की चीख़ों को सुला दिया करती है!
अपने दर्द को लफ़्ज़ दे देना—मगर उसे अपना मुकद्दर मत समझा कर!
ग़म को बस एक मौसम रहने दे, उसे उम्र भर का पता मत बनाया कर!
जो लोग चले गए, वो अपनी राह के मुसाफ़िर थे—उन्हें बददुआ मत दिया कर!
तेरे हिस्से की रोशनी तुझसे ही निकलेगी, किसी और से उसे माँगा न कर!
अपने भीतर के बच्चे को जिंदा रख, जो छोटी बातों पर भी मुस्काता है!
हर दिन के अंत में खुद से कह, “मैं बच गया”—और फिर शुक्र मनाया कर!
"प्रेरणा" एक दिन इश्क़ हो जाएगा तुझे इस ज़िंदगी से, बस भरोसा रखा कर!
तब तक खुशियों की आदत डालकर गम के गीत गाया न कर!
~प्रेरणा कानाणी "रूह"
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