"दो दिन के दो पंछी"(उपन्यास) by prerna kanani
~प्रस्तावना~
यह एक लघु उपन्यास है। जो मैंने अपने अवकाश के समय में लिखा था। हालांकि मैं इसे प्रकाशित करने के हेतु से नही लिखा था।
पर फिर भी मैं इस लघु उपन्यास के एक-एक प्रकरण ब्लॉग के माध्यम से शेर करूंगी।
1985 में "राम तेरी गंगा मैली" फिल्म देखने के बाद अजित और अमिता का प्रेम प्रकरण शुरू होता है।
अजित और अमिता गुजरात के सौराष्ट्र के एक गांव में रहने वाले है।दोनो पड़ोसी है।सालो से एक मोहल्ले में रहने के कारण दोनो के पारिवारिक संबंध है।
अजित गांव के बड़े जमीदार का बेटा है।उसकी उम्र 24 साल है। पेशा से किसान है। उसका परिवार गांव में काफी प्रतिष्ठित है। इतनी सारी जमीन का वारिस होने के कारण उसके परिवार ने उसे सिर्फ मेट्रिक तक ही पढ़ाई करने दी।कुछ समय पहले अजित तो क्षय रोग हुआ था।पूरी तरह से स्वस्थ होने के बाद भी अभी वह घर पर ही आराम कर रहा है। अजित ने इसी समय में किताबे पढ़ने का शुरू किया।
वह रात में अपने बरामदे में एक लाइट की रोशनी के उपन्यास पढ़ता था। अजित का घर अमिता के घर के एकदम सामने ही है। यहां तक की दोनो के घर के बरामदे से दोनो एक दूसरे को देख सकते।
अमिता भी गांव के प्रतिष्ठित जमीदार की बेटी है। जिसकी उम्र सिर्फ 18 साल है । हाईस्कूल की पढ़ाई पूरी की है। उसके माता पिता व्यवसाय के हेतु शहर में रहते है । वह अपने दादा और दादी के साथ गांव में रहती है। दादी की तबियत खराब रहने के कारण वह घर काम और और अपने जमीन के काम में भी ज्यादा ध्यान देती है।
अमिता की खूबसूरती उस समय की अभिनेत्रीया हेमा मालिनी और मंदाकिनी से कम नहीं थी।
पहले के समय में गांव में कहते थे,"लड़की इतनी सुंदर है की पानी पीती है तो भी गले से दिखता है"। यानी यूं कहो तो चांद जैसी सुंदर। अमिता की खूबसूरती के लिए भिब्यः कहा जा सकता है।
समय का चक्र आगे बढ़ता है। अजित और अमिता 12 साल से एकदूसरे से बेइंतहा मोहब्बत करते थे। दोनो ने उम्र भर साथ निभाने का वादा किया था। फिर ऐसा तो क्या हुआ की 12 साल के लंबे समय बाद अमिता अजित को शादी के लिए मना कर देती है..!!
और अपने शादी वाले दिन अपनी सहेली के हाथो अजित को आखिर बार मिलने के लिए चिठ्ठी भिजवाती है।
किसी और की दुल्हन बनने वाली थी!!! हाथ में मेहंदी,बालो में गजरा,शादी का जोड़ा इत्यादि सोलह श्रृंगार के साथ और महेमानो से भरे घर से छुपकर अजित को मिलने जाती है।वह उसकी आखिरी मुलाकात थी..!
यहां पर उसने अजित से क्या कहा होगा?? उसके 12 साल के प्रेम का क्या?? अब क्या होगा दोनो की जिंदगी में??यह वक्त के साथ आपको पता चलेगा।
~यह एक सत्य घटना आधारित कहानी है। जो मेरे निजी स्वजन की है। यहां पर किरदार के नाम बदल दिए गए है।और रोचक बातें और तथ्य के साथ आप सबके सामने प्रस्तुत करती हु।
~प्रेरणा कानाणी
प्रकरण : 1
सर्दियां समाप्त हो गई थी, गर्मिया शुरू होने वाली थी, ऋतु चक्र चलता रहता है। उन दिनों होली का त्योहार नजदीक था। पर अजित और अमिता के लिए यह होली खास बनने वाली थी। प्यार हमारा नजरिया बदल देता है। जीने की राह बदल देता है। जिंदगी किस मोड़ पर हमे लेके खड़ा कर देती है यह हमारे लिए भी सपने जैसा होता है। हम अंजान होते है।
अमिता की मेट्रिक की परीक्षा हो गई थी। अब उसकी सहेलियों एक दिन उससे कहा की गांव में "राम तेरी गंगा मैली" नामक फिल्म लगी है। तो वो भी देखने आए। अमिता बहुत ही सीधी और घरेलू लड़की थी। जिसे घर के कामों में मदद करना अच्छा लगता है। उसके अलावा उसका दुनियादारी और फिल्मजगत से कोई वास्ता नहीं था। पर जब उसकी सहेलियों ने उसे ज्यादा भारपूर्वक कहा तो वो उसके साथ फिल्म देखने के लिए मान गई। शायद बेमन से बस दोस्ती का मान रखने के लिए गई।
अब तक वो अपनी खूबसूरती से अंजान थी। शायद उसे पहली नजर का प्यार यह सब अनुभूति का पता ही नही था। पर वो अपनी सहेलियों के साथ फिल्म देखने जाती है। उस समय वहा गांव में राम मंदिर के आगे वाले मैदान में फिल्म लगती थी। फिल्म का वो गीत अमिता के मन को छू जाता है;
" हुस्न पहाड़ों का ओ साहिबा
क्या कहना की बारों महिने
यहाँ मौसम जाड़ों का..!"
यह गीत अमिता घर आने के बाद गुनगुनाने लगती है। कई दिनों तक इसी गीत के बोल की धुन उसपर सवार थी। तभी एक दिन पड़ोस में ही अजित के मां की तबियत खराब हो गई थीं। परस्पर पारिवारिक संबंध अच्छे थे। वो कहते है ना पहला संबंधी पड़ोसी होता है। अमिता की दादी ने उससे कहा:
" अमी, जा पड़ोस वाले रमिला बहन की तबियत खराब है,तू उसे खाना बनाके देके आ। और वैसे भी उसके घर में है की कौन अब!! उसका बेटा अजित,रमिला बहन और प्रेमजी भाई तीन ही लोग है! जा देके आ,उनको अच्छा लगेगा।"
उसके बाद अमिता अजित के घर पर खाना देने जाती है। अजित अपने बरामदे में चारपाई पर लेटा हुआ था। क्योंकि क्षय रोग से अभी अभी ठीक हुआ था। पास में कुछ उपन्यास की किताबे पड़ी हुई थी। और अजित अभी लेखक बनने के सफर में था। लिखना बस सिख रहा था। एक उपन्यास लिख रहा था। तभी उसकी मां ने उसे बुलाया:
" अजित, अमिता यह सब खाना लाई है तू खाने के रसोई घर में ढककर रख दे,!! "
" हां,अभी रख देता हूं "।
अजित वहा से चला जाता है,अमिता बरामदे में चार पाई के पास जाती है। वैसे तो अमिता को यह सब उपन्यास और किताब में कोई दिलचस्पी नहीं थी। पर फिर भी उसने यूं ही बस ऐसे एक किताब उठाई। दरसल वो वही किताब थी जो अजित लिख रहा था। किताब के पहले पेज पर नाम " तेरी पहली नजर" नाम था और लेखक का नाम "अजित पटेल" अमिता चौक गई!!! उसने मन में सोचा ये किताब भी लिखते है!!!! उसने एक पन्ना और आगे का देखा। जिसमे एक कविता थी। जो इस तरह थी:
"तेरी वो कत्थई आंखे जो,
पहली नजर में दिल को छू गई!!
तेरी वो मासूमियत जो,
पहली नजर में दिल को छू गई!!
तेरी वो झुकी हुई पलके,
जो पहली नजर में दिल को छू गई!!
वैसे तो पहले मुझे यकीन न था पहली नजर में,
पर तेरी पहली नजर इश्क का नशा दे गई!
मेरी हर सांस तेरे नाम कर गई!!
इजहार ही करना बाकी था!!
पर मेरी रूह तुझे खुदा मान गई थी!!"
अमिता ने यह पढ़ा और उसे वही फिल्म फिर याद आई और उसका गीत हुस्न पहाड़ों का याद आया। तभी अजित अंदर से बरामदे में आया। अमिता उसे देखकर हड़बड़ा गई। और किताब नीचे रख दी। अजित को तभी ही एक अलग अनुभूति हुई!!! पर उसकी अमिता से बात भी नहीं हुई थी। अमिता ने शर्म से उसकी लिखी हुई किताब रख दी। और वहा से चली गई। ये क्या था??? क्या पहली नजर का प्यार होता है???
~पहली नजर के प्यार को लेकर कही सारे मत है। दरअसल उम्र जैसे ही बचपन से जवानी में परिवर्तित होती है। तभी दुनिया को हम अलग ही नजरिए से देखने लगते है। कायनात कयामत लगने लगती है। सब कुछ परिवर्तन होता दिखाई पड़ता है। इसी उम्र में कही न कही हम अपने बचपन के वो मासूम चेहरे को खो देते है। प्यार एक रहस्यमई चीज है..!! गालिब के शब्दो में कहूं तो "करो तो बेहाल है और न करो तो भी बेहाल!!"
यहां अजित और अमिता के दिल में भी कुछ हो रहा था!!! पर सब कुछ समझ से परे था।उसी शाम अजित अपनी छत पर सो रहा था। तभी अमिता उसे अपनी छत से कुछ कहती है। वो अपने सपने के बारे में कहना चाहती थी। पर कह नही पाती तो उसने अजित को कहा की वो कल उसे चिट्ठी भिजवाएगी। तभी के समय चिट्ठी लिखना काफी प्रचलित था।
तो यह हमारे अजित और अमिता के पहली नजर वाले प्यार की पहली चिट्ठी थी। क्या थी आखिर वह चिट्ठी जिसमे अमिता अजित को अपने सपने के बारे में कुछ बताने वाली थी। दरसल अमिता को अजित से थोड़ा थोड़ा प्यार हो गया था। वह उसे अब छत से देखती और कभी बरामदे से । पर उसने कहा नहीं था। और आज अचानक रात को वो चिट्ठी से अपने सपने के बारे में बताने की बात करती है?? क्या वह प्यार का इजहार होगा?? क्या आया था उसके सपने में? यह सब उलझाने वाला है। पर पहली नजर के प्यार की पहली चिट्ठी के बारे में कुछ अल्फाज..!
" वह पहली नजर के प्यार की
पहली चिट्ठी..!
चिट्ठी में अल्फाज के रूप में
रखा हुआ तेरा दिल..!
लगता है सब कुछ तेरा उसी चिट्ठी में है..!
बाकी सब तनिक सा रह गया है..!
वादा रहा!! फूल सी चिट्ठी को,
अपना बना लेंगे..!"
~प्रेरणा जगदीश कानाणी ✨✍️
प्रकरण 2
~प्यार की चिट्ठी
रात बहुत धीरे-धीरे सरक रही थी। जैसे समय भी जानता हो कि इस रात को जल्दी खत्म नहीं होना चाहिए। दो छतों के बीच पसरी खामोशी में न कोई आवाज़ थी, न कोई हलचल सिवाय उन दिलों की, जो पहली बार अपने ही धड़कने से डर रहे थे।
अमिता अपनी छत पर बिछे पतले गद्दे पर करवटें बदल रही थी। आसमान में टिमटिमाते तारे आज उसे सामान्य नहीं लग रहे थे। हर तारा जैसे कोई सवाल पूछ रहा हो क्या हुआ है तुम्हें? वह खुद भी नहीं जानती थी कि उसे क्या जवाब देना है।
उसके कमरे में रखा काग़ज़, कलम और दिया हुआ दिया- सब जैसे उसे देख रहे थे। वह उठी, धीरे से काग़ज़ उठाया और फिर रख दिया। मन बार-बार कहता-मत लिख, और दिल हर बार जवाब देता लिखे बिना चैन नहीं मिलेगा।
"कभी-कभी शब्द लिखे नहीं जाते, शब्द हमसे खुद को लिखवा लेते हैं..."
उसके मन में बार-बार वही दृश्य कौंध रहा था- बरामदे में पड़ी चारपाई, उस पर बिखरी किताबें, और उस किताब में लिखी कविता। उसे आज भी याद था कि कैसे किताब के पन्ने पलटते वक्त उसके हाथ कॉप रहे थे। और फिर अजित का अचानक आ जाना... उसकी नज़रें, उसकी खामोशी- सब कुछ अनकहा था, पर बहुत कुछ कह गया था।
अमिता ने आखिरकार कागज़ सामने रखा। कलम उठाई और पहली पंक्ति लिखते ही उसकी आँखें भर आईं। यह डर नहीं था, यह अपराधबोध भी नहीं था यह बस वही भाव था, जो पहली बार दिल को अपना वजूद समझा रहा था।
उसने चिट्ठी लिखी बहुत सधी हुई, बहुत संकोच से भरी, पर उतनी ही सच्ची। उसने अपने सपने के बहाने अपना दिल रख दिया था। चिट्ठी पूरी होने के बाद उसने उसे सीने से लगा लिया। जैसे कोई अनमोल चीज़ हो, जिसे खो देने का डर हो। अमिता ने लिखा :
"अजीत,मुझे नहीं पता था कि यह सब इतनी जल्दी हो जाएगा! बरामदे में आपको देखते देखते मुझे आपसे प्यार होने लगा है। मेरे जीवन में सब कुछ बदल गया है। जैसे जैसे में अब आपके बारे में सोचती हु मुझे अच्छा लगता है! मेरे ख्वाबों में भी आप ने जगह ले ली है! कल रात मैने सोमनाथ महादेव के मंदिर में हम दोनों को साथ में दर्शन करते हुए देखा! वो सपना में आपके साथ सच करना चाहती हु! हा में आपके साथ जीवन का हर लम्हा बिताना चाहती हु!!! मुझे आपकी तरह शायरी लिखना नहीं आता पर ये सरल भाषा में अपना दिल रख रही हु। आपके जवाब का इंतज़ार रहेगा।"
वैसे तो दिखने में यह खत जैसा भी नहीं लगता है पर अमिता ने अपने दिल को इसमें लपेटा हुआ है। अक्सर हमने प्रेम कहानियां में देखा है कि लड़का अपने प्यार का इजहार करता है। पर यहां एक मासूम सी अभी अभी युवानी का स्वाद चखी लड़की अपने सरल शब्दों में दिल रखती है! और अपनी खूबसूरत जिंदगी के ख्वाब सजाती है।
अजीत और अमिता के पहले प्यार की पहली चिट्ठी! उसे दिन रात बहुत हो गई थी। इसीलिए अमिता सुबह चिट्ठी भिजवाना चाहा। अमित सुबह घर का सारा काम करके तैयार हो चुकी थी। उससे चिट्ठी ज्यादा तो नहीं आता था। पर जितना आता था उसने अपने दिल की बात रखने की कोशिश की थी। अमिता की चिट्ठी मानो उसका पूरा दिल था। उसने पहली नजर के प्यार की चिट्ठी में कुछ यूं लिखा;
सुबह हुई। गाँव की गलियों में हलचल शुरू हो गई। कहीं गायों की घंटियों बज रही थीं, कहीं चूल्हों पर रोटियों सिक रही थीं। उस सुबह अमिता कैसे भी करके अपनी वो चिट्ठी अजीत को देना चाहती थी। इसलिए वो अजीत की मां की खबर पूछने के बहाने अजीत के घर गई। घर जाके देखा तो अजीत के घर में कोई नहीं था। सिर्फ अजीत अपने बरामदे में किताब पढ़ रहा था। अजीत ने अमिता को देख लिया और अंदर आने को कहा।
अमिता पहले तो थोड़ी घबराई; फिर अजीत बोला,"अंदर आओ न!! वो आज सब लोग खेत पर गए है, तुम कल रात कुछ मुझसे कहता चाहती थी वो तो में भूल ही गया!!
अमिता अचानक घबरा गई उसके दिल की धड़कन तेज होने लगी थी ! " हा वो......!
"बोलो न में सुन रहा हु।" अजीत ने उसे आश्वासन भरी निगाहों से देखा ।
"आपको कुछ देना था,पर आप मुझसे वादा करो कि इस बारे में आप आराम से मुझे जवाब दोगे...!
अमित आने अपने हाथ में रखी चिट्ठी अजीत को दे दी..!
तभी अजीत के मां घर पर आ गए थे। उन्होंने अमिता देखा और बैठने के लिएकहा और बैठने के लिए कहा। पर अमित को देर हो रही थी इसीलिए वह नहीं बैठी और अपने घर चली गई।
फिर अजीत वो चिट्ठी खोल कर पढ़ने लगा। अमिता की लिखावट कुछ खास नहीं थी । काफी शब्द ठीक से लिखे हुए भी नहीं थे। पर फिर भी अजीत ने वो चिट्ठी खोलकर पढ़ी..!
अमिता का हाल कुछ इस तरह हुआ!
"तेरा ये मासूम सा प्यार
और तेरी लिखी ये चिट्ठी !
चिट्ठी में तेरी और तेरे प्यार की ये महक!
पर ये कमबख्त दिल अब भी तेरी मासूमियत की फिक्र करता है..!"
अजीत को समझ नहीं आ रहा था कि क्या करे! खुशी मनाए या ग़म!! अजीत ने पूरी रात ऐसे ही निकाल दी आज वो छत पर सोने के लिए भी नहीं गया था । अमिता उसका बहुत ही बेसब्री से छत पर इंतज़ार कर रही थी। पर अजीत दिखा ही नहीं वो निराश हो गई और डर गई कि क्या उसे कुछ हो गया है! क्या उसने अपनी दिल की बात कहकर गलती कर दी !! अगर मोहल्ले में किसी को पता चल गया तो सब लोग क्या सोचेंगे !!! एक ही पड़ोस में रहते है। अगर अजीत ने मेरे दादा और दादी को बता दिया तो!!!! उसका मन बहुत ही घबरा गया था।
दअरसल हमारी समाजव्यवस्था में लड़कियों के लिए कुछ नियम बहुत ही क्रूर है। लड़कियां समाज या परिवार के डर से अपने प्यार को कुर्बान कर देती है। हर वो औरत जिसका प्यार अधूरा रहा और किसी कारणवश मंडप तक नहीं पहुंच सका ख्वाब अधूरे रहे । कुछ लड़कों की नजरों में उस के लिए औरत को जिम्मेदार माना जाता है। की वो शादी के लिए नहीं मानी! पर औरत के लिए उस समय अपने प्यार और परिवार में से किसी एक को चुनना बहुत ही मुश्किल हो जाता है। वो अपने आप से लड़ती है। उसे हर पल अपने परिवार का भी ख्याल आता है। यह उन लोगों के लिए सोचने की बात है जो कहते है कि कोई भी लड़की प्यार में परिवार के बारे में नहीं सोचती ! पर हकीकत कुछ और ही होती है। औरत अपने प्यार और परिवार के आगे मजबूर हो जाती है। आज भी हमारी समाज व्यवस्था ऐसी समस्या में फंसी औरत के चारित्र पर सवाल उठाती है। हमें हमारी बेटियों को इतना मजबूत बनाना चाहिए कि वो समझौता किए बिना समस्या का हल ढूंढे।
यहां अमिता भी कुछ इसी तरह लोग क्या बाते बनाएंगे उसी सोच में डूबी हुई थी। बेचैनी बढ़ती जा रही थी!!! रात भी बढ़ती जा रही थी।। अमिता करवटें लेती जा रही थी। इधर अजीत भी ठीक से सो नहीं पा रहा था। वो कुछ और ही सोच रहा था। अजीत ने रात को ही निर्णय कर लिया था कि वो इस चिट्ठी का जवाब अमिता को सुबह जब सब लोग खेत पर चले जाएंगे तो अपने घर बुलाएगा।
अभी दोनों को सुबह होने का इंतज़ार था। अमिता पूरी रात भगवान से प्रार्थना कर रही थी। क्योंकि वो अजीत को खोना नहीं चाहती थी। सुबह तो रोज होती है। पर अजीत और अमिता के जीवन में ये सुबह बहुत ही खाश थीं। पर कहते है न जो समय का हमे बहुत ही ज्यादा इंतज़ार होता है वह समय आने के लिए बहुत ही समय लेता है। अंधेरी रात ढलने का नाम ही नहीं ले रही थी।
"ए रात आज तू ढल जा जल्दी
मेरे महबूब से मिलने की आज तलब है मुझे!
मेरे हृदय का स्पंदन कह रहा काश हो जाए
अंधेरी रात के बाद सवेरा..!
"कुछ एहसास घर से बाहर निकल जाएँ, तो लौटने तक साँसें अधूरी लगती हैं..."
उधर अजित देर से उठा। बीमारी ने उसके शरीर को कमज़ोर किया था, पर मन को और ज़्यादा संवेदनशील बना दिया था। वह बरामदे में बैठा धूप सेंक रहा था, तभी चिट्ठी उसके हाथ में आई। उसने पहले लिफ़ाफ़े को देखा-लिखावट पहचान में नहीं आ रही थी, पर नाम पढ़ते ही दिल थक से रह गया।
उसने चिट्ठी खोली। हर पंक्ति उसके भीतर उतरती चली गई। यह कोई इज़हार नहीं था, पर इज़हार से कम भी नहीं था। यह डर और उम्मीद के बीच लिखा गया एक सच था।
अजित ने चिट्ठी मोड़ी और देर तक हाथ में पकड़े रखा। वह समझ गया था यह वही पहली नज़र का असर था, जिसे वह अब तक कागज़ों में ढूँढता रहा था।
उस दिन उसने अपने अधूरे उपन्यास के पन्ने पलटे। बहुत से शब्द अब उसे बेमानी लग रहे थे। उसने एक नया पन्ना जोड़ा और लिखा-
"पहली नज़र अगर सपना है, तो उसे टूटने से पहले थाम लेना चाहिए। और अगर वह सच है, तो उसे शब्दों में नहीं,
ज़िम्मेदारी में बदलना चाहिए।"
शाम ढलने लगी। होली की तैयारियों तेज़ हो गई थीं। बच्चों की टोलियों रंग जमा कर रही थीं, औरतें पापड़ सुखा रही थीं। अजित छत पर आया। सामने वाली छत पर अमिता भी खड़ी थी।
आज दोनों की नज़रें ठहरी। न कोई मुस्कान, न कोई इशारा बस एक गहरी रामझ।
"कुछ रिश्ते बोलने से नहीं, ठहर जाने से शुरू होते हैं..."
हवा में अब बसंत की खुशबू थी। सर्दियों जा चुकी थीं और गर्मियों की आहट साफ़ थी। ठीक वैसे ही जैसे बचपन पीछे छूट रहा था और जवानी धीरे-धीरे दरवाज़ा खटखटा रहीं थी।
उस रात दोनों अलग-अलग छतों पर सोए, पर सपने एक जैसे थे। दोनों जानते थे- यह सिर्फ एक चिट्ठी नहीं थी, यह दो जिंदगियों के बीच खिची पहली रेखा थी।
बस अब इंतज़ार का प्यार की स्वीकृति का या अस्वीकृति का..! क्या शुरू होगी एक नई कहानी !!!!
प्रकरण : 3
रंगों से पहले की धड़कन
होली आने में अब बस दो ही दिन बाकी थे। गाँव की हवा में रंगों की गंध घुलने लगी थी। गलियों में बच्चों की शोरगुल, छतों पर सूखते कपड़े, आँगनों में बनते पकवान सब कुछ जैसे किसी बड़े उत्सव की तैयारी में जुटा था। पर इन सबके बीच, दो दिल ऐसे थे जिनमें उत्सव नहीं, एक अनजानी घबराहट पल रही थी।
अमिता के लिए ये दिन कुछ अलग थे। चिट्ठी भेज देने के बाद वह भीतर से बदल चुकी थी। अब वह पहले जैसी नहीं रही थी। हर छोटी-सी आवाज़ पर उसका ध्यान अजित के घर की ओर चला जाता। छत पर जाती तो उसकी नज़र अनायास ही सामने वाली छत ढूँढने लगती।
"कुछ इंतज़ार घड़ियों से नहीं होते, वो दिल की हर धड़कन गिनते हैं..."
दूसरी ओर अजित भी स्वयं को सामान्य दिखाने की कोशिश कर रहा था। पर चिट्ठी उसके तकिये के नीचे सुरक्षित रखी थी। रात को सोने से पहले वह उसे निकालता, पढ़ता और फिर मोड़कर रख देता। जैसे हर बार पढ़ने से वह सपना थोड़ा और सच हो जाता हो।
उस शाम उसने तय किया अब और नहीं। यह जवाब लिखेगा।
काराज़ सामने रखा। कलम उठाई। पर इस बार शब्द डर के साथ नहीं, विश्वास के साथ उतर रहे थे।
*"अमिता,
तुम्हारा सपना पढ़कर में देर तक खामोश रहा। शायद इसलिए कि कुछ सपने जवाब नहीं माँगते, बस साथ माँगते हैं।
अगर होली के रंगों से पहले तुम्हारी आँखों में जो रंग है, वहीं मेरा सच है।
उस दिन भीड़ में अगर मैं तुम्हें ही देख पाया, तो समझ लेना- यह सपना नहीं था।
अजित *"
चिट्ठी लिखते समय अजित के हाथ कॉप नहीं रहे थे। पहली बार उसे लगा कि वह किसी कहानी को नहीं, अपनी ज़िंदगी को लिख रहा है।
अगली सुबह अमिता को वह चिट्ठी मिली। लिफ़ाफ़ा खोलते ही उसकी साँस रुक-सी गई। शब्द पढ़ते-पढ़ते उसकी आँखें नम हो गईं। यह इज़हार नहीं था, पर इज़हार से कहीं ज्यादा गहरा था।
"कुछ जवाब आवाज़ में नहीं आते, वो सीधे दिल पर दस्तक देते हैं..."
उस दिन दोनों पहली बार आमने-सामने मिले। बहाने से पड़ोस की औरतों के साथ, मंदिर के पास। पर बातचीत सिर्फ उनकी हुई।
अमिता ने धीमी आवाज़ में कहा, "आपने चिट्ठी में लिखा... अगर वो सपना सच है।"
अजित मुस्कुराया, "कुछ सच सपनों से ही शुरू होते हैं।"
अमिता की आँखें झुक गईं। "मुझे डर लगता है," उसने कहा, "अगर यह सब... गलत हुआ तो?"
अजित ने पहली बार उसकी ओर पूरी तरह देखा, "डर तो मुझे भी लगता है। पर बिना डर के अगर सब मिल जाए, तो उसे प्यार नहीं कहते।"
"जहाँ डर हो, वहीं भरोसे की असली परीक्षा होती है..."
होली का दिन आ गया। सुबह से ही गाँव रंगों में डूबा हुआ था। ढोल की थाप, हँसी की आवाजें, हवा में उड़ते गुलाल- सब कुछ जैसे जीवन का उत्सव मना रहा था।
अमिता सफ़ेद सलवार में थी। सादगी में भी वह अलग ही चमक रही थी। अजित दूर से ही उसे देख रहा था। उसके हाथ में गुलाल था, पर कदम आगे नहीं बढ़ पा रहे थे।
अचानक बच्चों की टोली ने दोनों को घेर लिया। किसी ने अमिता के गाल पर रंग लगा दिया। अजित बस देखता रह गया।
"पहला रंग जब किसी और का हो, तो दिल थोड़ा-सा टूटता है..."
अमिता ने अजित की ओर देखा। उसकी आँखों में शिकायत नहीं थी, बस एक सवाल था। अजित ने धीरे से आगे बढ़कर, बहुत संकोच से, उसके माथे पर हल्का-सा रंग लगाया।
वो पल छोटा था, पर उम्र भर का हो गया।
अमिता ने फुसफुसाकर कहा, "अब डर नहीं लग रहा।"
अजित ने जवाब दिया, "क्योंकि अब हम अकेले नहीं हैं।"
"कुछ पल इतने हल्के होते हैं, कि पूरी ज़िंदगी उन्हीं पर टिक जाती है..."
शाम ढलते-ढलते दोनों अपने-अपने घर लौट आए। पर आज लौटना वैसा नहीं था। आज उनके पास एक-दूसरे की चिट्ठियाँ थीं, कुछ अधूरे वाक्य थे, और ढेर सारी उम्मीदें।
यह होली उनके जीवन की पहली होली थी- जहाँ रंगों से पहले, दिल रंग चुका था।
Very beautifully written the emotions of the Hero n Heroine of your Novel 👍words r very touchy. Waiting for next chapter 😊
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